सावन माह के तीसरे सोमवार 17 अगस्त को 40 ग्रामों से आएगी कांवड़ यात्राएं, लगेगा एक दिवसीय मेला, होगा भंडारा
चीताखेड़ा। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार मानसून ने मिनी हरिद्वार के नाम से विख्यात जीरन तहसील के अंतर्गत चीताखेड़ा दलपतपुरा के बीच झील में स्थित 11 वीं सदी का अतिप्राचीन मंदिरों में प्रसिद्ध तीर्थ स्थल रामझर महादेव मंदिर यह मंदिर ग्वालियर स्टेट के जमाने में 800 वर्षों से भी अधिक प्राचीन है यहां पर नाथ बाबा पंथ के सिद्धयोगी रामनाथ महाराज ने शिवलिंग की स्थापना की थी, तभी से इस तीर्थ का नाम रामझर महादेव हो गया। इस मनोहारी स्थल ने नदी की तट पर विशाल वृक्षों के बीच पहाड़ियों की वादियों में नई जान फूंक दी।
विगत 3 दिनों से चल रही रिमझिम- रिमझिम बारिश ने रामझर महादेव की वादियों को एक बार फिर से जीवंत कर दिया। जब पहाड़ियों की चट्टानों से तेज वेग के साथ कल-कल बहती जलधारा का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है तब देखते ही बन जाता है। बारिश के साथ ही सूनी पड़ी नदी और पहाड़ियां फिर से गुलजार हो गई है। चीताखेड़ा और जीरन आसपास के क्षेत्र में हुई अच्छी बारिश का असर नदी नालों पर भी साफ दिखाई दिया। जलस्तर बढ़ने के साथ रामझर महादेव नदी में पानी का बहाव शुरू फिलहाल नहीं हुआ है, जिससे क्षेत्र में मानसून की वास्तविक दस्तक का एहसास हुआ। नदी में बहते कल-कल ध्वनि की आवाज फिलहाल सुनने को नहीं मिल रही है। सावन माह लगते ही क्षेत्र के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का रुख रामझर महादेव की ओर होने लगा। मंदिर समिति की अपील, सौंदर्य का आनंद लें, लेकिन सतर्क रहें :- सावन माह की शुरुआत के साथ बढ़ते शिवभक्तों को देखते हुए मंदिर समिति और पुलिस प्रशासन ने श्रद्धालुओं व पर्यटकों से सावधानी बरतने की अपील की है। नदी नाले के तेज बहाव वाले क्षेत्रों में जाने से बचने तथा सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है, ताकि मानसून का आनंद किसी हादसे में न बदल जाए। वादियों में लौटी रौनक, श्रद्धालुओं व पर्यटकों को मिलेगी रफ्तार :- हर वर्ष मानसून के मौसम में रामझर महादेव नदी में बहती कल-कल पानी की ध्वनि हजारों पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनता है। इस बार नदी में पानी के बहाव के साथ श्रद्धालुओं गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है। मंदिर का इतिहास :- इस रामझर महादेव मंदिर का इतिहास पुरातात्विक प्राचीन धरोहर से जुड़ा हुआ है, जो इस धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व प्रदान करता है। इसकी खासियत यह है कि बड़ी-बड़ी शिलाओं से निर्मित है, गर्भ ग्रह में स्थापित शिवलिंग अति प्राचीन है, गर्भ ग्रह के बाहर नंदी महाराज की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर की विशेषता :- मंदिर के गर्भ ग्रह में शिव परिवार स्थापित है, जिसमें कार्तिकेय , गणपति जी और मां पार्वती जी की प्रतिमा स्थापत्य कला की अप्रतिम कारीगरी है, सभी प्रतिमा वरदहस्त है। मंदिर पुजारी विष्णु गिर गोस्वामी का कहना है कि यह मंदिर अति प्राचीन काफी सिद्धहस्त हैं यहां आस-पास तथा दूरदराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जन पूजा अर्चना व अभिषेक के लिए आते हैं। यहां विशेष कर श्रावण माह के तीसरे सोमवार को और कार्तिक पूर्णिमा को भव्य मेले का आयोजन मंदिर समिति द्वारा आयोजित किया जाता है। यहां हमारी पांचवीं पीढ़ी इस मंदिर की व्यवस्था संभाले हुए हैं,और पूजा अर्चना करती आ रही है। मंदिर समिति अध्यक्ष केशुराम जाट ने बताया है कि मंदिर में आकर आत्मिक शांति मिलती है, यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोवांछित मुरादे पूरी होती है। इससे यह मंदिर जिले में ख्याति प्राप्त है। श्रावण मास के तीसरे सावन सोमवार को हर वर्ष बड़ी संख्या में दर्जनों ग्रामों से हजारों कांवड़िए कांवड़ लेकर आते हैं और यहां जनसहयोग से मंदिर समिति द्वारा भंडारे का आयोजन किया जाता है और यहां कार्तिक पूर्णिमा पर एक दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है मेले में हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। *इस बार भी आगामी दिवस 17 अगस्त सावन सोमवार को अलग-अलग 40 ग्रामों से कांवड़िए कांवड़ यात्रा लेकर आएंगे और एक दिवसीय मेले का आयोजन मंदिर समिति द्वारा आयोजित किया जाएगा जिसकी तैयारियां शुरू कर दी गई है ।
मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा।