नगर परिषद जावद की मंशा पर उठे गंभीर सवाल
जावद। सरकारी जमीनों के आवंटन को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहने वाली जावद नगर परिषद का एक और विवादित मामला सामने आया है। रामलीला मैदान से लगी नगर परिषद की बहुमूल्य भूमि, जिसे वर्षों पूर्व बेहद कम दरों पर लीज पर दिया गया था, उसे पुनः उसी पुराने मूल्य पर उन्हीं लोगों को आवंटित करने की तैयारी की जा रही है। यह पूरा मामला बिना किसी सार्वजनिक विज्ञप्ति या टेंडर प्रक्रिया के आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, 9 फरवरी को आयोजित साधारण सभा की बैठक में उक्त भूमि की लीज नवीनीकरण का प्रस्ताव रखा गया। जिस भूमि को वर्षों पहले पट्टी-स्टॉक के उद्देश्य से दिया गया था, वहां आज तक कोई भी व्यावसायिक गतिविधि शुरू नहीं की गई। इसके बावजूद नगर परिषद द्वारा फिर से उसी पक्ष को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
इस प्रस्ताव को लेकर परिषद के भीतर भी असहमति सामने आई है। भाजपा के चार पार्षदों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध जताया, वहीं साधारण सभा की बैठक में ये चारों पार्षद अनुपस्थित रहे। यदि स्थिति पर गौर किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उक्त चारों पार्षद इस पूरे मामले में सहमत नहीं हैं। इसके बावजूद प्रस्ताव को जस का तस बनाए रखा गया, जो परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। उल्लेखनीय है कि यह भूमि वर्षों पूर्व तत्कालीन नगर परिषद अध्यक्ष स्वर्गीय मांगीलाल हकवाडिया के कार्यकाल में आवंटित की गई थी। उस समय न तो सख्त गाइडलाइन थी और न ही व्यावसायिक उपयोग को लेकर आम जनता में विशेष रुचि। लेकिन वर्तमान समय में, बढ़ती व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के दौर में भी इस प्रमुख स्थान की भूमि का उपयोग न होना और फिर भी लीज बढ़ाने की तैयारी कई शंकाओं को जन्म देती है। वर्ष 2016 में भी इस भूमि की लीज बढ़ाने का प्रस्ताव आया था, जिसे तत्कालीन परिषद ने एक सिरे से खारिज कर दिया था। ऐसे में अब दोबारा उसी तरह का प्रस्ताव लाना और वह भी बिना टेंडर प्रक्रिया के, नियमों को ताक पर रखने जैसा प्रतीत हो रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि पुनः आवंटन करना ही था तो खुली निविदा प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, जिससे नगर परिषद को अधिक राजस्व प्राप्त होता। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में नगर परिषद अध्यक्ष सोहनलाल माली की विशेष रुचि बताई जा रही है। अपनी ही पार्टी के पार्षदों की असहमति और अनुपस्थिति के बावजूद प्रस्ताव को आगे बढ़ाना संभावित भ्रष्टाचार की आशंका को और गहरा करता है। इनका कहना है—
“यदि किसी प्रस्ताव के दौरान किसी पार्षद द्वारा आपत्ति दर्ज की जाती है, तो उसके निराकरण की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। आपत्ति करने वाला पार्षद कलेक्टर कार्यालय में अपनी आपत्ति दर्ज कर सकता है, जहां से उसका निराकरण किया जाता है।” — प्रीति संघवी, एसडीएम जावद अब यह देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या इस बहुमूल्य भूमि के आवंटन की प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं।