वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती पर राणावत राजपूत समाज ने राणा प्रताप को याद कर बताया कैसे आक्रांताओं को धूल चटा दी थी
सरवानिया महाराज। आज देश भर में शोर्य और पराक्रम की अमर कहानी के महान नायक हिंदुआ शेर वीर शिरोमणि प्रातः स्मरणीय राष्ट्रभक्ति अदम्य साहस स्वाभिमानी महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जा रही है। हिंदुस्तान के राजस्थान की मीट्टी में जन्मे देश धर्म और संस्कृति मातृ भूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले राजपूत कूल गौरव महाराणा प्रताप को आज देश उनके देश काल धर्म संस्कृति राष्ट्रहित में किए गए कार्यों को लेकर नमन कर रहा है।
इस अवसर पर सरवानिया महाराज में भी राणावत राजपूत समाज के नैतृत्व में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर नीमच सिंगोली रोड़ के समीप श्री महाराणा प्रताप की आदम कद प्रतिमा पर दीप प्रज्ज्वलित कर माल्यार्पण कर जयंती की शुरुआत की गई। बड़ी संख्या में समाजजनों ने उपस्थित होकर मेवाड़ शिरोमणि को याद किया। इस अवसर पर नगर परिषद अध्यक्ष रूपेंद्र सिंह जैन ने कहा कि राणा प्रताप केवल एक योद्धा ही नहीं थे बल्कि राष्ट्र स्वाभिमान त्याग और अटुट वीरता के लिए जाने जाते हैं। राणा प्रताप के जीवन मुल्यों और आदर्शों को अपनाकर हम समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं।
इस दौरान भाजपा मण्डल अध्यक्ष अर्जुन माली, नगर अध्यक्ष हेमंत पुरोहित, नगर परिषद उपाध्यक्ष रामलाल राठौर, कालूसिंह राणावत, राजेश प्रताप सिंह (टुन्नी बना) राणावत, जितेन्द्रसिंह राणावत इंजीनियर, अजय प्रताप सिंह राणावत, शिवराजसिंह राणावत, उमेशसिंह राणावत, योगेन्द्रसिंह राणावत, लक्ष्मणसिंह राणावत, मंयक प्रतापसिंह राणावत, दिपेंद्रसिंह राणावत, करण प्रतापसिंह राणावत, हर्षवर्धनसिंह राणावत, हर्षदीपसिंह राणावत, विजयपाल सिंह राणावत, रघुवीर सिंह राणावत पूर्व पार्षद भूपेंद्रसिंह राणावत भेरुसिंह राणावत, कानसिंह राणावत सहित अन्य उपस्थित थे। आभार राजपुरोहित चंन्द्रनारायण पालीवाल ने माना। महाराणा प्रताप और इतिहास जन्म 9 मई 1540 (शुक्ल पक्ष तृतीया) को मेवाड़ की पावन धरा पर हुआ। वे भारतीय स्वाभिमान, अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक है। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण मातृभूमि, धर्म और मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। अपार कठिनाइयों, जंगलों और अभावों के बीच भी उन्होंने कभी पराधीनता स्वीकार नहीं की और स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। हल्दी घाटी वीरता की गाथा हल्दीघाटी का युद्ध उनके अद्वितीय शौर्य, पराक्रम और अटूट संकल्प का अमर उदाहरण है।
आक्रांता मुगल बादशाह अकबर को धुल चटा दी। अपने प्रिय अश्व चेतक के साथ उन्होंने वीरता की ऐसी गाथा लिखी, जो आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम का संचार करती है। जीवन के अंतिम क्षणों तक वे मेवाड़ की स्वतंत्रता और जनकल्याण के लिए संघर्षरत रहे। 19 जनवरी 1597 को उनका देहावसान हुआ, किंतु उनका यश, त्याग और पराक्रम अमर हो गया ।