मनासा। नीमच जिले के मनासा विकासखंड के छोटे से गाँव फूलपुरा में एक किसान की जिद ने खेती की तस्वीर बदल दी है। डीएपी, यूरिया और जहरीले कीटनाशकों से लदी जमीन को जब प्रकाश खूंवार ने नीमास्त्र और वर्मी कम्पोस्ट से सींचना शुरू किया, तो न सिर्फ उनका खर्च घटा बल्कि मिट्टी भी जी उठी।
कुछ वर्ष पहले तक प्रकाश अपनी 10 बीघा जमीन पर हर साल लगभग 60 हजार रुपये रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर खर्च करते थे। सुपर फॉस्फेट, सल्फर, यूरिया—दुकान की हर थैली एक नई उम्मीद लेकर आती और फसल कटने के बाद मायूसी छोड़ जाती। मिट्टी की ताकत घट रही थी और लागत बढ़ती जा रही थी। तीन साल पहले प्रकाश संस्था सॉलिडेरिडाड से जुड़े, यहां पुनर्योजी कृषि पर आयोजित प्रशिक्षण ने उनकी सोच ही बदल दी। उन्होंने घर पर ही नीमास्त्र तैयार किया, घनजीवामृत बनाया और वर्मी कम्पोस्ट की इकाई स्थापित की। खास बात यह है कि वे स्वयं इसमें जीवामृत मिलाते हैं और कम्पोस्ट को नियमित रूप से नम बनाए रखते हैं, ताकि जमीन में पनपने वाले सूक्ष्म जीव जीवित रहें। आज उनकी खेती की लागत घटकर मात्र 12 हजार रुपये रह गई है,
यानी पहले की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत की बचत और उपज? 4 से 5 बीघा में 55 से 60 बोरी गेहूँ—पूरी तरह रसायनमुक्त, जिसकी बाजार में मांग और कीमत दोनों बेहतर हैं। सॉलिडेरिडाड के महाप्रबंधक डॉ. सुरेश मोटवानी कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेती में रासायनिक निर्भरता घटाने का आह्वान किया है। भारत-यूरोपीय संघ की साझेदारी के अंतर्गत कार्यक्रम में हम किसानों को पुनर्योजी कृषि से जोड़ रहे हैं। प्रकाश खूंवार इस अभियान के अग्रदूत बन गए हैं।" प्रकाश अब अकेले नहीं चल रहे, वे अपने आसपास के किसानों को भी इस राह पर आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका सीधा संदेश है— "धीरे-धीरे रसायन छोड़ो, अपनी मिट्टी को पहचानो, खेती खुद फायदेमंद बन जाएगी।"