महाकालेश्वर मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो मध्य प्रदेश राज्य में रुद्र सागर झील के किनारे बसे प्राचीन शहर उज्जैन में स्थित है जो हिंदुओं के सबसे पवित्र और उत्कृष्ट तीर्थ स्थानों में से एक है।
इस मंदिर में दक्षिण मुखी महाकालेश्वर महादेव भगवान शिव की पूजा की जाती है। महाकाल के यहां प्रतिदिन सुबह के समय भस्म आरती होती है।
इस आरती की खासियत यह है कि इसमें मुर्दे की भस्म से महाकाल का श्रृंगार किया जाता है। इस जगह को भगवान शिव का पवित्र निवास स्थान माना जाता है।
यहां पर आधुनिक और व्यस्त जीवन शैली होने के बाद भी यह मंदिर यहां आने वाले पर्यटकों को पूरी तरह से मन की शांति प्रदान करता है।
इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह एक अत्यंत पुण्यदायी मंदिर है। माना जाता है कि इस मंदिर के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर, रुद्र सागर झील के किनारे स्थित है। महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है। भगवान शिव का यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है जिसको भगवान शिव का सबसे पवित्र निवास स्थान माना जाता है।
भगवान शिव मंदिर के प्रमुख देवता हैं जो लिंगम रूप में वहां मौजूद हैं।
महाकालेश्वर मंदिर को भारत के टॉप 10 तंत्र मंदिरों में से एक माना जाता है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भस्म-आरती (राख की रस्म) की रस्म निभाई जाती है। यह आरती रोज़ भगवान शिव को जगाने के लिए की जाती है। भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए दुनिया के विभिन्न कोनों से लोग मंदिर में आते हैं।
महाकालेश्वर के इतिहास के बारे में बात करें तो, बता दें कि सन 1107 से लेकर 1728 तक उज्जैन में यवनों का शासन रहा था। इस शासन काल में लगभग हिंदुओं की प्राचीन परम्पराएं लगभग नष्ट हो गई थी। इसके बाद मराठो ने 1690 में मालवा क्षेत्र में हमला कर दिया था। फिर 29 नवंबर 1728 में मराठा शासकों ने मालवा में अपना शासन कर लिया था। इसके बाद उज्जैन की खोया हुआ गौरव और चमक फिर से वापस आई इसके बाद यह साल 1731 से 1728 के बाद यह मालवा मालवा की राजधानी बनी रही।
मराठो के अधिपत्य के समय यहां पर 2 बड़ी घटनाए हुई। पहली घटना यह थी कि पहले यहां पर स्थित महाकालेश्वर मंदिर का फिर से निर्माण किया गया और ज्योतिर्लिंग की ख़ोई हुई प्रतिष्ठा वापस मिली। इसके अलावा यहाँ सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना की गई जो बेहद खास उपलब्धि थी। आगे चलकर इस मंदिर का विस्तार राजा भोज द्वारा किया गया।उज्जैन आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक, महाकालेश्वर मंदिर के रहस्य और कहानी के बारे में जानने में काफी रूचि रखते हैं।
आपके मन में भी उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के इतिहास को लेकर काफी सवाल होंगे। तो चलिए आपको इस मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देते हैं। पुराण के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर बहस हुई थी, कि सृष्टि में सर्वोच्च कौन है। उनका परीक्षण करने के लिए भगवान शिव ने तीनों लोकों में प्रकाश के एक अंतहीन स्तंभ को ज्योतिर्लिंग के रूप में छेदा और इसके बाद भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा क्रमशः प्रकाश के अंत का पता लगाने के लिए, स्तंभ के साथ नीचे और ऊपर की ओर यात्रा करते हैं। लेकिन ब्रह्मा जी झूठ बोल देते हैं कि उन्हें अंत मिल गया और विष्णु हार मान लेते हैं। फिर शिव प्रकाश के स्तंभ के रूप में प्रकट होते हैं और ब्रम्हा जी को श्राप देते हैं कि उनका किसी भी समारोहों में कोई स्थान नहीं होगा, जबकि विष्णु जी की अनंत काल तक पूजा होगी।
ज्योतिर्लिंग वो जगह है जहाँ भगवान शिव प्रकाश के रूप में प्रकट हुए थे। बारह ज्योतिर्लिंग स्थलों में से प्रत्येक में शिव के अलग-अलग नाम हैं। इन सभी ज्योतिर्लिंग को भगवान शिव का अलग-अलग स्वरुप माना जाता है। इन बारह ज्योतिर्लिंग में गुजरात का सोमनाथ, आंध्र प्रदेश के श्रीसैलम का मल्लिकार्जुन, मध्य प्रदेश में उज्जैन का महाकालेश्वर, मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर, उत्तराखंड राज्य में हिमालय का केदारनाथ, महाराष्ट्र में भीमाशंकर, उत्तर प्रदेश के वाराणसी का त्रयंबकेश्वर, झारखंड के देवगढ़ में या हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ, गुजरात में द्वारका का नागेश्वर, तमिलनाडु में रामेश्वरम का रामेश्वर और महाराष्ट्र में औरंगाबाद का ग्रिशनेश्वर का नाम शामिल है।