सिंगोली । अक्षय तृतीया जैन श्रवण संस्कृति के इतिहास में महत्वपूर्ण दिवस माना जाता है इसी दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने लगभग एक वर्ष तेरह दिन दीर्घ उपवास के बाद इच्छुरस (गन्ने का रस) से आहर ग्रहण किया था यह सौभाग्य राजा श्रेयांश उनके भाई राजा सोम को प्राप्त हुआ था इसलिए यह दिवस दान रूप में जाना जाता है आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य अर्ह योग प्रणेता मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज ने अक्षय तृतीया का महत्व बताते हुए कहा कि दान तीर्थ से ही धर्म तीर्थ कि शुरुआत होती है जो व्यक्ति देना नहीं चाहता वह कभी धर्म सीख ही नहीं सकता ग्रहस्त की शोभा दान से हैं दान दुर्गति का विनाश करता है इसलिए जो अपने जीवन को सुरक्षित और सार्थक बनाना चाहते है उन्हें दान अवश्य करना चाहिए धन कमाओ खूब कमाओ लेकिन न्याय नीतिऔर प्रमाणिकता से कमाओ लक्ष्मी सबको प्रिय है परंतु धन के साथ जुड़े दोषों के प्रक्षालन के लिए दान जरूरी है वही पुज्य मुनिश्री ससघ को आहरदान देने के लिए समाजजनों ने चोके बनाए जहा पर पुज्य मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज आर्यिका प्रशममति माताजी को आहरदान देने का सोभाग्य सघस्त बाल ब्रह्मचारिणी दीदीयो को प्राप्त हुआ आहरदान देने के दोरान इच्छुरस (गन्ने का रस) जैसे ही मुनिश्री कि अन्जुली मे दिया तो आदिनाथ भगवान के जयकारे लगाए गए यह दिन दान दिवस के रुप में प्रसिद्ध है इस दोरान बड़ी संख्या में समाजजन ने मुनिश्री व आर्यिका माताजी को आहरदान दिया