शीतला सप्तमी की पौराणिक व्रत कथा, तभी मिलेगा पूजा का पूर्ण फल

Neemuch headlines March 10, 2026, 7:25 am Technology

हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी का विशेष महत्व है, जिसे 'बासौड़ा' भी कहा जाता है। चैत्र मास (Chaitra Month) के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाए जाने वाले इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत माता शीतला को लगने वाला भोग है। इस दिन देवी को ताजा भोजन नहीं, बल्कि एक दिन पहले बना बासी और ठंडा पकवान अर्पित किया जाता है, जो शीतलता और आरोग्य का प्रतीक है।

शीतला सप्तमी व्रत की कथा :-

एक समय की बात है एक वृद्ध महिला और उसकी दो बहुओं ने देवी शीतला के लिए कठिन व्रत का पालन किया। दोनों बहुओं ने मान्यताओं के अनुसार, एक दिन पहले ही प्रसाद के लिए भोजन बनाकर तैयार कर लिया, लेकिन दोनों बहुओं के बच्चे छोटे थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि कहीं बासी खाना उनके बच्चों को नुकसान न कर दे। इसलिए उन्होंने बच्चों के लिए ताजा खाना दोबारा से तैयार किया, जब वे दोनों शीतला माता की पूजा के बाद घर वापस लौटीं, तो उन्होंने अपने बच्चों को मृत पाया। इस दृश्य को देखकर वे जोर-जोर से विलाप करने लगीं। शीतला सप्तमी आज, इस विधि से करें पूजा,

नोट करें मंत्र और महत्व:-

जिससे शीतला और ओरी ने प्रसन्न होकर दोनों को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। तब उन दोनों बहुओं ने अपनी सारी व्यथा उन दोनों बहनों को बताई। इस पर शीतला माता अपने स्वरूप में उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें बताया कि "ये सब शीतला सप्तमी के दिन ताजा खाना बनाने के कारण हुआ है। तब दोनों बहुओं ने माता शीतला से क्षमा याचना की और आगे से ऐसा न करने को कहा।" माता शीतला ने खुश होकर दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों बहुएं बड़ी प्रसन्नता के साथ घर लौटीं और तभी से शीतला माता के लिए व्रत करने लगीं। होली के बाद किस दिन मनाया जाएगा बासोड़ा, इस दिन चूल्हा न जलाने की है खास वजह बासोड़ा या बसौड़ा पूजा मुख्य रूप से देवी शीतला को समर्पित है, जो होली के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर की जाती है। इस दिन को शीतला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसे में चलिए जानते हैं होली के बाद शीतला अष्टमी कब मनाई जाएगी और इस दिन का क्या महत्व है।

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